रविवार, 4 जून 2017

भगवान शिव का सबसे बड़ा प्रमाण

भारत आज भी आस्था बड़ा केंद्र देश रहा है यहाँ ये धरती चमत्कारों की धरती यहाँ जगह जगह चमत्कार मिल जाते है तो आज हम भगवान के सब से सब से बड़े प्रमाण की बात करते है


क्या शिवलिंग एक एटॉमिक ( आणविक )  रिएक्टर  है ?....
 

शिवलिंग पर जल, बिल्व पत्र और आक क्यूं चढ़ाते हैं ?

भारत का रेडियो एक्टिविटी मैप उठा लो तो हैरान हो जाओगे~कि  भारत सरकार के न्यूकिलिअर रिएक्टर के अलावा सभी ज्योत्रिलिंगो के स्थानों पर सबसे ज्यादा रेडिएशन पाया जाता है |  

शिवलिंग और कुछ नहीं बल्कि न्यूक्लिअर रिएक्टर्स ही हैं तभी उनपर जल चढ़ाया जाता है ताकि वो शांत रहे। महादेव के सभी प्रिय पदार्थ जैसे  बिल्व पत्र, आक, आकमद, धतूरा, गुड़हल, आदि सभी न्यूक्लिअर एनर्जी सोखने वाले हैं |

क्यूंकि शिवलिंग पर चढ़ा पानी भी रिएक्टिव हो जाता है तभी जल निकासी नलिका को लांघा नहीं जाता | भाभा एटॉमिक रिएक्टर का डिज़ाइन भी शिव लिंग की तरह है

जैसे सूर्य पर जल चढाते समय , जल से होकर शरीर पर पड़ती सूर्य किरणे ,शारीरिक रोगों को नष्ट करती है , उसी प्रकार , शिवलिंग पर जल और दूध चढाते समय , शिवलिंग से निकलती अद्रश्य आणविक   विकरण ऊर्जा ~जल से हानिरहित होकर ~अत्यंत लाभकारी बनकर ~सभी त्रितापो ~दैहिक दैविक तापो को नष्ट कर देती है

शिवलिंग पर चढ़ाया हुआ जल नदी के बहते हुए जल के साथ मिल कर औषधि का रूप ले लेता है |

इसीलिए ज्यादातर ज्योतिर्लिंग  नदियो के किनारे स्थित है ~ हमारे बुजुर्ग हम लोगों से कहते रहे है ~ कि महादेव शिव शंकर अगर नराज हो जाएंगे तो प्रलय आ जाएगी |

ज़रा गौर करो, हमारी परम्पराओं के पीछे कितना गहन विज्ञान छिपा हुआ है |

ये इस देश का दुर्भाग्य है कि हमारी परम्पराओं को समझने के लिए जिस विज्ञान की आवश्यकता है वो हमें पढ़ाया नहीं जाता, और विज्ञान के नाम पर जो हमें पढ़ाया जा रहा है उस से हम अपनी परम्पराओं को समझ नहीं सकते |

क्या आणविक ऊर्जा भी सदाशिव ,महाकाल का ही एक रूप है ? जी हाँ यही सत्य है~जब तक सात्विक बुद्धि से इसका उपयोग होता है~यह सदाशिव की तरह असीमित ऊर्जा के साथ सर्व सुख सम्पन्नता  प्रदान करती है और दुरूपयोग होते ही महाकाल का रूद्र तांडव शुरू हो जाता है~

जिस संस्कृति की कोख से हमने जन्म लिया है वो सनातन है,
इसी विज्ञान को कालानतर में लुप्त होने से बचाने के लिए परम्पराओं का जामा पहनाया गया है, ताकि वो प्रचलन बन जाए और हम भारतवासी सदा वैज्ञानिक जीवन जीते रहें |

 "उँ त्रयम्बकम यजामहे सुगंधिम पुष्टि वर्धनम -उर्वारुक मीव् बन्धनान, मृत्योरमुक्ष्यीयमामृतात"।
                                   
ॐ नमः शिवाय ।।

शनिवार, 20 मई 2017

कहां है भगवान परशुराम का फरसा ?

राजधानी से करीब 150 किलोमीटर दूर गुमला जिले में एक पहाड़ पर स्थित है टांगीनाथ धाम। दावा किया जाता है कि इस पहाड़ी पर एक मंदिर में भगवान परशुराम का फरसा गड़ा है। यहां रहने वाले लोगों के मुताबिक, एक बार एक लोहार ने परशुराम के फरसा को चोरी करने की कोशिश की थी। थोड़े दिनों बाद उसकी मौत हो गई। कहा जाता है कि जो भी इस फरसा से छेड़छाड़ की कोशिश करता है उसे खामियाजा भुगतना पड़ता है। नहीं लगता कभी जंग...


- कहा जाता है कि खुले में रहने के बावजूद परशुराम के फरसा में आजतक कभी जंग नहीं लगा।
- जंग न लगने की खासियत से आकर्षित होकर इलाके के में रहने वाली लोहरा जनजाति के कुछ लोगों ने फरसे को ले जाने की कोशिश की थी।
- उखाड़ने की कोशिश में असफल होने पर उन्होंने फरसे के ऊपरी भाग को काट दिया, लेकिन उसे भी नहीं ले जा सके।
- इस घटना से सबक लेते हुए लोगों ने जमीन की ढलाई करवा दी और उसी ढलाई में फरसे का टूटा हुआ हिस्सा भी स्थापित कर दिया।
- उधर, फरसे से छेड़छाड़ का खामियाजा लोहरा जाति को अब भी भुगतना पड़ रहा है।
- कई जेनरेशन के बाद आज भी उस जाति का कोई व्यक्ति टांगीनाथ धाम के आस-पास के गांवों में नहीं रह पाता।
- कहते हैं उक्त घटना के बाद से ही इलाके में लोहरा जाति के लोगों की एक-एक कर मौत होने लगी।
- डर के मारे उन्होंने अपना ठिकाना बदल लिया और अब भी धाम के आस-पास फटकने से डरते हैं।

खुले में पड़ी हैं दुर्लभ प्रतिमाएं

- टांगीनाथ धाम में सैकड़ों की संख्या में शिवलिंग और प्राचीन प्रतिमाएं खुले आसमान के नीचे पड़ी हैं।
- ये प्रतिमाएं उत्कल के भुवनेश्वर, मुक्तेश्वर, गौरी केदार आदि स्थानों से खुदाई में प्राप्त मूर्तियों से मेल खाती हैं।
- बता दें कि पुरातत्व विभाग ने 1989 में टांगीनाथ धाम में खुदाई करवाई थी। इसमें सोने-चांदी के आभूषण समेत कई कीमती वस्तुएं मिली थीं।
- कुछ कारणों से यहां खुदाई जल्दी ही बंद कर दी गई और हमारे धरोहर फिर जमीन में दबे रहे गए।
- खुदाई में हीरा जड़ित मुकुट, चांदी के अर्धगोलाकर सिक्के, सोने के कड़े, सोने की कनबालियां, तांबे की बनी टिफिन जिसमें काला तिल व चावल रखा था, आदि चीजें मिलीं थीं।
- ये सब चीज़े आज भी डुमरी थाना के मालखाने में रखी हुई हैं। खुदाई का अचानक बंद होने और वस्तुओं को मालखाने में पड़ा होने के पीछे क्या वजह थी, यह आज भी रहस्य है।

खुद भगवान परशुराम ने यहां गाड़ा था फरसा

- किवदंतियों के अनुसार यह फरसा भगवान परशुराम ने यहां खुद गाड़ा था।
- पौराणिक गाथाओं के अनुसार लाखों साल पहले हुए भगवान परशुराम का टांगीनाथ धाम से क्या रिश्ता हो सकता है, यह शोध का विषय है लेकिन यहां उनके आगमन की एक बहुत ही दिलचस्प कहानी कही जाती है।
- त्रेतायुग के दौरान जनकपुर में स्वयंवर के दौरान शिवजी का धनुष तोड़ने के बाद सीताजी से विवाह कर श्रीराम भाई लक्ष्मण और अन्य परिजनों के साथ अयोध्या लौट रहे थे।
- रास्ते में विष्णु के ही एक अन्य अवतार माने जाने वाले परशुराम ने उन्हें रोक लिया। वे शिवजी का धनुष तोड़े जाने से नाराज थे, क्योंकि शिवजी ही परशुराम के गुरु थे।
- परशुराम ने राम को खूब बुरा-भला कहा, लेकिन वे मौन रहे पर लक्ष्मण को गुस्सा आ गया। उन्होंने परशुराम के साथ लंबी बहस की और इसी बीच परशुराम को पता चल गया कि राम भी उनकी तरह विष्णु के ही अवतार हैं।
- ये जानकर परशुराम बहुत लज्जित हुए और अपने किए का प्रायश्चित करने के लिए घनघोर जंगलों के बीच एक पहाड़ पर आ गए। उस पहाड़ पर उन्होंने अपना फरसा गाड़ दिया और बगल में बैठकर तपस्या करने लगे।
- गुमला के लोग पीढ़ियों से यह किवदंती सुनते आए हैं कि परशुराम ने जिस जगह तपस्या की थी वह टांगीनाथ धाम ही है। धाम में परशुराम के पदचिन्ह भी मौजूद हैं।


टांगीनाथ धाम में गड़ा भगवान परशुराम का फरसा।

इस फरसा में आजतक जंग नहीं लगी।

जंग न लगने के कारण कई बार ये रिसर्च भी किया गया कि आखिर ये किस धातु का बना है।

टांगीनाथ धाम में स्थित एक छोटा प्राचीन मंदिर।

जमीन में गड़ा हुआ भगवान परशुराम का फरसा।


टांगीनाथ धाम में पड़ा टूटा हुआ शिखर।

टांगीनाथ धाम में एक मंदिर में पूजा करती महिला।

टांगीनाथ धाम में खंडित मूर्ति।

टांगीनाथ धाम में खुदाई में निकली हुई चीजें जो मालखाने में हैं।

टांगीनाथ धाम का मेन गेट