जनवरी 2019 में प्रयागराज (पहले इलाहाबाद) में कुंभ मेला आयोजित होने जा रहा है. दुनिया के कुछ सबसे बड़े धार्मिक अनुष्ठानों में से एक इस मेले में तेरह अखाड़ों के साधु-संत शिरकत करेंगे. तमाम खासियतों के अलावा एक और चीज मेले में देखी जा सकती है वो है साधु-संतों का भांग-गांजे के नशे में धुत्त रहना. भारतीय कानून के तहत दोनों ही चीजों का सेवन अवैध है लेकिन कुंभ के दौरान ये साधु-संतों के दिन का अभिन्न हिस्सा होते हैं तो इसकी वजह है भगवान शिव का भांग के साथ संबंध. माना जाता है कि भांग शिवजी का प्रिय प्रसाद था और भांग का नशा शिवभक्ति का ही एक हिस्सा है. धर्म के साथ भांग का ताल्लुक पुरातन काल से चला आ रहा है.
भांग को शिव का प्रिय भोजन मानने की वजह से शिवरात्रि पर भांग मिली हुई चीजें महाप्रसाद के रूप में दी जाती हैं. भगवान शिव से इससे जुड़ाव को लेकर भी कई कहानियां मिलती हैं. एक प्रचलित कहानी के अनुसार एक बार परिवार में तनाव की वजह से शिव घर छोड़कर निकल गए. काफी दूर जाने पर उन्हें प्यास लग आई, पास ही एक हरा-भरा पौधा देख उसकी पत्तियां तोड़कर खा लीं, जिससे उन्हें तुरंत ताजगी मिली. ये भांग का पौधा था. तब से भांग शिव का प्रसाद हो गई . एक अन्य प्रचलित कहानी बताती है कि अमृत मंथन के दौरान निकले जहर को शिवजी नेअपने कंठ में धारण कर लिया. इससे उन्हें काफी तकलीफ होने लगी, ये देखकर दूसरे देवताओं ने उन्हें भांग खिला दी ताकि ठंडक और आराम मिले. तब से ही भांग का संबंध शिवजी के साथ जुड़ गया.
हिंदुओं के चार प्रमुख वेदों में से एक अर्थववेद में भांग को धरती के चुनिंदा पवित्र पौधों में से एक माना गया है. इसके अलावा वट, पीपल, नारियल, अशोक, बेल, केला, तुलसी और कमल के पौधे को पवित्र माना गया है. भांग के बारे में माना जाता है कि इसे केवल सपने में देखने से भी देखने वाले को किसी भी काम में सफलता मिलती है. इसे खुशी और आध्यात्मिक आजादी का स्त्रोत माना गया है.
भांग को अंग्रेजी में cannabis कहते हैं जिसके गुण पश्चिम के marijuana से काफी मिलते-जुलते हैं, हालांकि भांग में टीएचसी यानी उस साइको-एक्टिव तत्व की मात्रा कम होती है जिससे नशा हो जाए. भारत में ब्रिटिश राज से पहले भांग खुलेआम बाजार में बिका करती थी और शिव के प्रसाद के नाम पर लोग इसका सेवन करते. कॉलोनियल भारत में अंग्रेजों ने इसके लिए कमीशन तैनात की जो भांग की पैदावार और बिक्री पर रोक लगा सके. भांग का सेवन सीमित करने के ब्रिटिश प्रयासों पर कहीं लोग भड़क न जाएं, इसलिए इसी दौरान 1000 ब्रिटिश और भारतीय मेडिकल प्रैक्टिशनरों से इंटरव्यू किया गया और उनसे इसके नुकसान पर बात की गई. साक्षात्कार के इस लंबे सिलसिले के बाद भी अंग्रेजी हुकूमत काफी पशोपेश में रही कि इस आध्यात्मिक बूटी का चलन कैसे रोका जाए.
आजाद भारत में नारकोटिक्स ड्रग्स और साइकोट्रॉपिक सब्सटेन्सेज़ एक्ट ऑफ 1985 के तहत भांग के कई हिस्सों के उत्पादन, बिक्री और खरीदी पर रोक लगा दी गई. सरकारी मान्यता प्राप्त भांग की दुकानों में ही भांग की वैध बिक्री होती है. हालांकि कई धार्मिक स्थलों जैसे वाराणसी, प्रयागराज और पुष्कर में भांग खुलेआम और चोरीछिपे भी सालभर मिलती है. शिवरात्रि के अलावा कई ऐसे धार्मिक अवसर भी हैं, जब भक्त भांग का सेवन करते हैं. होली भी ऐसा ही एक त्योहार है, जब ठंडाई में भांग मिलाकर खाई जाती है. इसके अलावा लस्सी और पकौड़ों में भी भांग मिलाकर शिव प्रसाद के नाम पर भक्त खाते-खिलाते हैं.
भांग की पैदावार और सेवन कानूनन वैध न होने के बाद भी मेले में ये खुलेआम मिलती है तो इसकी वजह है धार्मिक छूट. भारत ही नहीं, चीन, तिब्बत और जमैका में भी भांग को धर्म से जोड़ा गया है. चीन की ताओइज्म मान्यता में इसे सुप्रीम सीक्रेट एसेंशियल कहा गया है, जो आध्यात्मिक आजादी देता है. स्क्य्थिंस यानी यूरोप, मध्य एशिया और रूस के बीच भटकने वाला बंजारा समुदाय भी इसे शुद्धि का साधन मानता रहा. ग्रीक दस्तावेजों में भी इसका जिक्र मिलता है.
कई शोधकर्ताओं का कहना है कि बाइबिल के ओल्ड टेस्टामेंट में भी इसका जिक्र है. साल 1936 में पोलैंड की शोधकर्ता सूला बेनेट ने इसकी शुरुआत की, जिसका कहना था कि हिब्रू शब्द “kaneh bosm” का अर्थ भांग ही है. हालांकि इसपर अभी कई विवाद हैं.
जमैका में चली सामाजिक बदलाव की मुहिम जिसे रैस्ताफ़ेरियनिज्म के नाम से जाना जाता है, में भी भांग को मान्यता मिली. इसे “wisdom weed” के नाम से संबोधित किया जाने लगा और रैस्ताफ़ेरियन यकीन करने लगे कि बाइबिल में जिस ट्री ऑफ लाइफ का जिक्र है, वो दरअसल भांग ही है. कनाडा और यूएस के कई राज्यों में भांग को कानूनी मान्यता मिली हुई है



