मंगलवार, 25 दिसंबर 2018

क्या वजह है की दुनियाभर में भांग को मानते हैं शिव का प्रसाद

भांग को अंग्रेजी में cannabis कहते हैं जिसके गुण पश्चिम के marijuana से काफी मिलते-जुलते हैं, हालांकि भांग में टीएचसी यानी उस साइको-एक्टिव तत्व की मात्रा कम होती है जिससे नशा हो जाए.
 क्या वजह है की दुनियाभर में भांग को मानते हैं शिव का प्रसाद
जनवरी 2019 में प्रयागराज (पहले इलाहाबाद) में कुंभ मेला आयोजित होने जा रहा है. दुनिया के कुछ सबसे बड़े धार्मिक अनुष्ठानों में से एक इस मेले में तेरह अखाड़ों के साधु-संत शिरकत करेंगे. तमाम खासियतों के अलावा एक और चीज मेले में देखी जा सकती है वो है साधु-संतों का भांग-गांजे के नशे में धुत्त रहना. भारतीय कानून के तहत दोनों ही चीजों का सेवन अवैध है लेकिन कुंभ के दौरान ये साधु-संतों के दिन का अभिन्न हिस्सा होते हैं तो इसकी वजह है भगवान शिव का भांग के साथ संबंध. माना जाता है कि भांग शिवजी का प्रिय प्रसाद था और भांग का नशा शिवभक्ति का ही एक हिस्सा है. धर्म के साथ भांग का ताल्लुक पुरातन काल से चला आ रहा है.

 क्या वजह है की दुनियाभर में भांग को मानते हैं शिव का प्रसाद

भांग को शिव का प्रिय भोजन मानने की वजह से शिवरात्रि पर भांग मिली हुई चीजें महाप्रसाद के रूप में दी जाती हैं. भगवान शिव से इससे जुड़ाव को लेकर भी कई कहानियां मिलती हैं. एक प्रचलित कहानी के अनुसार एक बार परिवार में तनाव की वजह से शिव घर छोड़कर निकल गए. काफी दूर जाने पर उन्हें प्यास लग आई, पास ही एक हरा-भरा पौधा देख उसकी पत्तियां तोड़कर खा लीं, जिससे उन्हें तुरंत ताजगी मिली. ये भांग का पौधा था. तब से भांग शिव का प्रसाद हो गई . एक अन्य प्रचलित कहानी बताती है कि अमृत मंथन के दौरान निकले जहर को शिवजी नेअपने कंठ में धारण कर लिया. इससे उन्हें काफी तकलीफ होने लगी, ये देखकर दूसरे देवताओं ने उन्हें भांग खिला दी ताकि ठंडक और आराम मिले. तब से ही भांग का संबंध शिवजी के साथ जुड़ गया.

 क्या वजह है की दुनियाभर में भांग को मानते हैं शिव का प्रसाद
हिंदुओं के चार प्रमुख वेदों में से एक अर्थववेद में भांग को धरती के चुनिंदा पवित्र पौधों में से एक माना गया है. इसके अलावा वट, पीपल, नारियल, अशोक, बेल, केला, तुलसी और कमल के पौधे को पवित्र माना गया है. भांग के बारे में माना जाता है कि इसे केवल सपने में देखने से भी देखने वाले को किसी भी काम में सफलता मिलती है. इसे खुशी और आध्यात्मिक आजादी का स्त्रोत माना गया है.

 क्या वजह है की दुनियाभर में भांग को मानते हैं शिव का प्रसाद

भांग को अंग्रेजी में cannabis कहते हैं जिसके गुण पश्चिम के marijuana से काफी मिलते-जुलते हैं, हालांकि भांग में टीएचसी यानी उस साइको-एक्टिव तत्व की मात्रा कम होती है जिससे नशा हो जाए. भारत में ब्रिटिश राज से पहले भांग खुलेआम बाजार में बिका करती थी और शिव के प्रसाद के नाम पर लोग इसका सेवन करते. कॉलोनियल भारत में अंग्रेजों ने इसके लिए कमीशन तैनात की जो भांग की पैदावार और बिक्री पर रोक लगा सके. भांग का सेवन सीमित करने के ब्रिटिश प्रयासों पर कहीं लोग भड़क न जाएं, इसलिए इसी दौरान 1000 ब्रिटिश और भारतीय मेडिकल प्रैक्टिशनरों से इंटरव्यू किया गया और उनसे इसके नुकसान पर बात की गई. साक्षात्कार के इस लंबे सिलसिले के बाद भी अंग्रेजी हुकूमत काफी पशोपेश में रही कि इस आध्यात्मिक बूटी का चलन कैसे रोका जाए.

आजाद भारत में नारकोटिक्स ड्रग्स और साइकोट्रॉपिक सब्सटेन्सेज़ एक्ट ऑफ 1985 के तहत भांग के कई हिस्सों के उत्पादन, बिक्री और खरीदी पर रोक लगा दी गई. सरकारी मान्यता प्राप्त भांग की दुकानों में ही भांग की वैध बिक्री होती है. हालांकि कई धार्मिक स्थलों जैसे वाराणसी, प्रयागराज और पुष्कर में भांग खुलेआम और चोरीछिपे भी सालभर मिलती है. शिवरात्रि के अलावा कई ऐसे धार्मिक अवसर भी हैं, जब भक्त भांग का सेवन करते हैं. होली भी ऐसा ही एक त्योहार है, जब ठंडाई में भांग मिलाकर खाई जाती है. इसके अलावा लस्सी और पकौड़ों में भी भांग मिलाकर शिव प्रसाद के नाम पर भक्त खाते-खिलाते हैं.


भांग की पैदावार और सेवन कानूनन वैध न होने के बाद भी मेले में ये खुलेआम मिलती है तो इसकी वजह है धार्मिक छूट. भारत ही नहीं, चीन, तिब्बत और जमैका में भी भांग को धर्म से जोड़ा गया है. चीन की ताओइज्म मान्यता में इसे सुप्रीम सीक्रेट एसेंशियल कहा गया है, जो आध्यात्मिक आजादी देता है. स्क्य्थिंस यानी यूरोप, मध्य एशिया और रूस के बीच भटकने वाला बंजारा समुदाय भी इसे शुद्धि का साधन मानता रहा. ग्रीक दस्तावेजों में भी इसका जिक्र मिलता है.


कई शोधकर्ताओं का कहना है कि बाइबिल के ओल्ड टेस्टामेंट में भी इसका जिक्र है. साल 1936 में पोलैंड की शोधकर्ता सूला बेनेट ने इसकी शुरुआत की, जिसका कहना था कि हिब्रू शब्द “kaneh bosm” का अर्थ भांग ही है. हालांकि इसपर अभी कई विवाद हैं.



जमैका में चली सामाजिक बदलाव की मुहिम जिसे रैस्ताफ़ेरियनिज्म के नाम से जाना जाता है, में भी भांग को मान्यता मिली. इसे “wisdom weed” के नाम से संबोधित किया जाने लगा और रैस्ताफ़ेरियन यकीन करने लगे कि बाइबिल में जिस ट्री ऑफ लाइफ का जिक्र है, वो दरअसल भांग ही है. कनाडा और यूएस के कई राज्यों में भांग को कानूनी मान्यता मिली हुई है

रविवार, 23 सितंबर 2018

भगवान विष्णु के अनन्त स्वरूप के श्री अन्नतचतुर्दशी व्रत कथा

श्री अन्नतचतुर्दशी व्रत कथा ........ 📓 🎤

एक बार युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया । उस समय यज्ञ मंडप का निर्माण सुंदर तथा अद्भुत था । वह यज्ञ मंडप इतना मनोरम था कि, जल व स्थल की भिन्नता प्रतीत ही नहीं होती थी । जल में स्थल तथा स्थल में जल की भांति प्रतीत होती थी । बहुत सावधानी करने पर भी बहुत से व्यक्ति उस अद्भुत मंडप में धोखा खा चुके थे ।

भगवान विष्णु के अनन्त स्वरूप के श्री अन्नतचतुर्दशी व्रत कथा

एक बार कहीं से टहलते-टहलते दुर्योधन भी उस यज्ञ-मंडप में आ गया और एक तालाब को स्थल समझ उसमें गिर गया । द्रौपदी ने यह देखकर अंधों की संतान अंधीकह कर उनका उपहास किया । इससे दुर्योधन क्रोधित हो गया ।
यह बात उसके हृदय में बाण समान लगी । उसके मन में द्वेष उत्पन्न हो गया और उसने पांडवों से बदला लेने की ठान ली । उसके मस्तिष्क में उस अपमान का बदला लेने के लिए विचार उपजने लगे । उसने बदला लेने के लिए पांडवों को द्यूत-क्रीड़ा में हरा कर उस अपमान का बदला लेने की सोची । उसने पांडवों को जुए में पराजित कर दिया ।
पराजित होने पर प्रतिज्ञानुसार पांडवों को बारह वर्ष के लिए वनवास भुगतना पड़ा । वन में रहते हुए पांडव अनेक कष्ट सहते रहे । एक दिन भगवान कृष्ण जब मिलने आए, तब युधिष्ठिर ने उनसे अपना दुख कहा और दुख दूर करने का उपाय पूछा । तब श्रीकृष्ण ने कहा- हे युधिष्ठिर ! तुम विधिपूर्वक भगवानविष्णु का व्रत करो, इससे तुम्हारा सारा संकट दूर हो जाएगा और तुम्हारा खोया राज्य पुन: प्राप्त हो जाएगा ।
इस संदर्भ में श्रीकृष्ण ने उन्हें एक कथा सुनाई
प्राचीन काल में सुमंत नाम का एक नेक तपस्वी ब्राह्मण था । उसकी पत्नी का नाम दीक्षा था । उसकी एक परम सुंदरी धर्मपरायण तथा ज्योतिर्मयी कन्या थी । जिसका नाम सुशीला था । सुशीला जब बड़ी हुई तो उसकी माता दीक्षा की मृत्यु हो गई ।
पत्नी के मरने के बाद सुमंत ने कर्कशा नामक स्त्री से दूसरा विवाह कर लिया । सुशीला का विवाह ब्राह्मण सुमंत ने कौंडिन्य ऋषि के साथ कर दिया । विदाई में कुछ देने की बात पर कर्कशा ने दामाद को कुछ ईंटें और पत्थरों के टुकड़े बांध कर दे दिए ।
कौंडिन्य ऋषि दुखी हो अपनी पत्नी को लेकर अपने आश्रम की ओर चल दिए । परंतु रास्ते में ही रात हो गई । वे नदी तट पर संध्या करने लगे । सुशीला ने देखा- वहां पर बहुत-सी स्त्रियां सुंदर वस्त्र धारण कर किसी देवता की पूजा पर रही थीं । सुशीला के पूछने पर उन्होंने विधिपूर्वक अनंत व्रत की महत्ता बताई । सुशीला ने वहीं उस व्रत का अनुष्ठान किया और चौदह गांठों वाला डोरा हाथ में बांध कर ऋषि कौंडिन्य के पास आ गई ।
कौंडिन्य ने सुशीला से डोरे के बारे में पूछा तो उसने सारी बात बता दी । उन्होंने डोरे को तोड़ कर अग्नि में डाल दिया, इससे भगवान विष्णुजी का अपमान हुआ । परिणामत: ऋषि कौंडिन्य दुखी रहने लगे । उनकी सारी सम्पत्ति नष्ट हो गई । इस दरिद्रता का उन्होंने अपनी पत्नी से कारण पूछा तो सुशीला ने अनंत भगवान का डोरा जलाने की बात कहीं ।
पश्चाताप करते हुए ऋषि कौंडिन्य अनंत डोरे की प्राप्ति के लिए वन में चले गए । वन में कई दिनों तक भटकते-भटकते निराश होकर एक दिन भूमि पर गिर पड़े । तब अनंत भगवान प्रकट होकर बोले- हे कौंडिन्य ! तुमने मेरा तिरस्कार किया था, उसी से तुम्हें इतना कष्ट भोगना पड़ा । तुम दुखी हुए । अब तुमने पश्चाताप किया है । मैं तुमसे प्रसन्न हूं । अब तुम घर जाकर विधिपूर्वक अनंत व्रत करो । चौदह वर्षोंतक व्रत करनेसे तुम्हारा दुख दूर हो जाएगा । तुम धन-धान्य से संपन्न हो जाओगे । कौंडिन्य ने वैसा ही किया और उन्हें सारे क्लेशों से मुक्ति मिल गई।
श्रीकृष्ण की आज्ञा से युधिष्ठिर ने भी अनंत भगवान का व्रत किया जिसके प्रभाव से पांडव महाभारत के युद्ध में विजयी हुए तथा चिरकाल तक राज्य करते रहें.